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अभिनेत्री से संन्यासिनी तक - ममता कुलकर्णी

बालीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री ममता कुलकर्णी, जिन्होंने ‘तिरंगा’, ‘करन-अर्जुन’, और आशिक आवारा’ जैसी हिट फिल्मों के जरिए अपनी पहचान बनाई, आज संन्यास के मार्ग पर चलते हुए नई चर्चा का विषय बन गई हैं। उनका यह निर्णय न केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा को दर्शाता है, बल्कि जीवन के उस पहलू को उजागर करता है, जो सांसारिक मोह से ऊपर उठकर आत्मिक शांति की तलाश में समर्पित है।

20 अप्रैल 1972 को मुंबई में जन्मीं ममता कुलकर्णी ने 1992 में फिल्म ‘तिरंगा’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। उनका स्टारडम शिखर पर था, लेकिन उन्होंने 2002 में बालीवुड से अचानक दूरी बना ली। इसके बाद उनका नाम ड्रग्स माफिया और अंडरवर्ल्ड से जुड़ा, जिसने उनकी छवि पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया। लंबे समय तक विदेश में रहने के बाद, उनका यह निर्णय कि वे संन्यास लेंगी, निश्चित रूप से चौंकाने वाला था।

महाकुंभ के पवित्र अवसर पर ममता कुलकर्णी ने संगम में डुबकी लगाकर विधि-विधान से पिंडदान किया और गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यासिनी बन गईं। किन्नर अखाड़ा ने उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि प्रदान की और नया नाम श्रीयामाई ममता नंद गिरि दिया। यह केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं था, बल्कि उनके जीवन के पुनर्जन्म का प्रतीक था।

क्या पहले भी ऐसा हुआ है?

बालीवुड में ऐसे कई सितारे हुए हैं जिन्होंने अपनी चमकदार जिंदगी को छोड़कर संन्यास का मार्ग अपनाया। 1950 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में सूफी दर्शन और आध्यात्मिकता की ओर रुख किया। विनोद खन्ना, जो अपने समय के सुपरस्टार थे, ने ओशो के आश्रम में संन्यास लिया। हालांकि, ममता का यह कदम विशेष है क्योंकि उन्होंने न केवल आध्यात्मिकता को अपनाया, बल्कि किन्नर अखाड़ा से जुड़कर सामाजिक उत्थान की जिम्मेदारी भी ली।

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