भारत के इतिहास में क्षत्रिय समाज की भूमिका निर्णायक रही है। राष्ट्र की रक्षा, शासन व्यवस्था और सांस्कृतिक संरक्षण में क्षत्रिय समाज का योगदान अतुलनीय माना जाता है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक भारत तक क्षत्रिय समाज ने सत्ता, शौर्य और सेवा के माध्यम से देश को दिशा देने का कार्य किया। इतिहास के पन्नों में श्रीराम, श्रीकृष्ण, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोबिंद सिंह और रानी लक्ष्मीबाई जैसे उदाहरण मिलते हैं, जिन्होंने विदेशी आक्रमणों के सामने झुकने के बजाय संघर्ष को चुना। सीमाओं की रक्षा, युद्ध नीति और प्रशासनिक ढांचे के निर्माण में क्षत्रिय नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही। राज्य व्यवस्था के संचालन में भी क्षत्रिय समाज अग्रणी रहा। मौर्य, गुप्त, राजपूत, मराठा और सिख काल में न्याय व्यवस्था, कर प्रणाली और सैन्य संगठन को मजबूती मिली। राजा को केवल शासक नहीं, बल्कि प्रजा का संरक्षक माना गया। मंदिरों, मठों, गुरुकुलों और विद्या केंद्रों को संरक्षण देकर भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा की गई। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी क्षत्रिय समाज का योगदान उल्...
भारत में मनाए जाने वाले त्योहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के गहरे संबंध को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक है छठ पूजा, जो सूर्य उपासना, आत्मसंयम और शुद्धता का अनोखा पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में इसे अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आज यह पर्व प्रवासी भारतीयों के बीच भी अपनी पहचान बना चुका है। छठ पर्व की जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं। ऋग्वेद में सूर्य की उपासना और उनकी ऊर्जा को जीवनदाता बताया गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद सूर्य की पूजा की थी। वहीं महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। इसी परंपरा ने समय के साथ ‘छठ’ रूप धारण किया। षष्ठी देवी, जिन्हें छठ माई कहा जाता है, को संतान और समृद्धि की देवी माना जाता है। छठ पर्व चार दिनों तक चलता है। पहला दिन नहाय-खाय, जब व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन करते हैं। दूसरे दिन खरना में गुड़-चावल की खीर बनती है, जिसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा जाता है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य में अस्त होते सूर्य को जल अर्पि...