सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Mony:पैसा, जिदंगी और मौत


पैसा क्या है

कुछ लोग कहते हैं ये तो हाथ का मैल है, पैसा ही सब कुछ नहीं, पैसा भगवान नहीं लेकिन भगवान से कम नहीं। ये कुछ बातें पैसे को लेकर अक्सर सुनी जाती है। लेकिन वास्तव में पैसा है क्या, मुझे लगता है पैसा एक ऐसी चीज है, जिससे हम अपनी जिदंगी की गाड़ी को चला सके। अपनी आवश्यकताएं  पूरी कर सकें। बस, इससे बढ़कर पैसा कुछ नहीं। और यहीं पैसा जब जिदंगी नहीं मौत का कारण बन जाए तो ऐसे पैसे का क्या औचित्य। 

जिदंगी कम नहीं 


जिदंगी बेशकीमती होती है। मान लीजिए कभी आप बीमार होते हैं, सारी चीजें आपके आसपास होकर भी आप कुछ नहीं कर सकते। लाख स्वादिष्ट पकवान हो, आप खा नहीं सकते, दुनियां की खूबसूरती को देखना चाहेंगे लेकिन वह अच्छा नहीं लगेगा। और कहीं कोई ऐसी बीमारी हो जाए और उसका कोई इलाज न हो, चाहें आप करोड़ों खर्च कर दें, फिर भी कुछ नहीं हो सकता है। ऐसे में हम किसे बड़ा कहेंगे पैसा या जिदंगी, मुझे लगता है कि जिदंगी की कोई कीमत नहीं लगा सकता है। ऐसे लोग जो पैसे के लिए अपनी जिदंगी को दांव पर लगाते हैं, वह शायद इसके विषय में नहीं सोचते हैं। 

अब मौत की बात सुने

 मौत जिदंगी की एक सच्चाई है। ईश्वर ने हर जीव को अलग अलग आयु का जीवन दिया है। कोई एक दिन में अपने जीवन चक्र को  पूरा कर लेता है, तो कोई सौ साल में तो कोई एक हजार साल में। अब इंसान को लीजिए, कहने को इंसान को सौ साल जीना चाहिए, लेकिन मुश्किल से कोई सौ साल जी रहा है। पहले लोग अपनी स्वभाविक मौत से मरते थे, तो लोग कहते थे कि ईश्वर का बुलावा आ गया था, यमराज ले गए। आज मौत पर लोग ईश्वर को कम दोषी देते हैं, कहते हैं एक्सीडेंट से मौत हो गई, बीमारी से मर गए, या खुद अपनी हत्या कर ली। जब हर जीव के मौत का समय निश्चित है तो फिर उस जीव को अपने हाथों से मारने का किसी कोई हक नहीं है।

एक सीख ऐसी भी


अभी बालीवुड में एक सितारा चमका है, नाम है नवाजुद्दीन, माउंटेनमैन के नाम से जानने वाल इस शख्स से बात हुई तो उन्होंने एक बड़ी बात कहीं, जिदंगी में एक्टिंग के अलावा कुछ नहीं आता, खेतों में काम करते हुए भी सपने देखता था। मां कहती थी 12 साल में तो कूड़े का भाग्य बदल जाता है, तो फिर मेरी किस्मत क्यों नहीं बदलेगी। क्या हम ईश्वर के सबसे सुंदर कृति को यूं ही अपने हाथों कत्ल करने के चैन से रह सकते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विस्तारवाद नहीं विकासवाद

भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता:  एक नया आर्थिक युग भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) दोनों देशों के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की उपस्थिति में इस समझौते पर सहमति बनी, और 24 जुलाई 2025 को इसे औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित किया गया। यह समझौता न केवल दोनों देशों के बीच व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखता है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताओं के दौर में एक रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करता है। इस संपादकीय में हम इस समझौते से भारत को होने वाले लाभ, दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात होने वाले सामानों, और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का विश्लेषण करेंगे।भारत को होने वाले लाभभारत-यूके एफटीए भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह समझौता भारत को लाभ प्रदान करता है: निर्यात में वृद्धि:  समझौते के तहत, भारत के 99% निर्यात उत्पादों को यूके में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलेगा, जो भारत के लगभग सभी व्यापार मूल्य को कवर करता है। इससे भारत के श...

छठ पूजा: आस्था, विज्ञान और प्रकृति के संतुलन का पर्व

भारत में मनाए जाने वाले त्योहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के गहरे संबंध को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक है छठ पूजा, जो सूर्य उपासना, आत्मसंयम और शुद्धता का अनोखा पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में इसे अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आज यह पर्व प्रवासी भारतीयों के बीच भी अपनी पहचान बना चुका है। छठ पर्व की जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं। ऋग्वेद में सूर्य की उपासना और उनकी ऊर्जा को जीवनदाता बताया गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद सूर्य की पूजा की थी। वहीं महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। इसी परंपरा ने समय के साथ ‘छठ’ रूप धारण किया। षष्ठी देवी, जिन्हें छठ माई कहा जाता है, को संतान और समृद्धि की देवी माना जाता है। छठ पर्व चार दिनों तक चलता है। पहला दिन नहाय-खाय, जब व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन करते हैं। दूसरे दिन खरना में गुड़-चावल की खीर बनती है, जिसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा जाता है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य में अस्त होते सूर्य को जल अर्पि...

हम दो हमारे कितने?

मोहन भागवत का "तीन बच्चे" बयान: विज्ञान, राजनीति और इतिहास से जुड़ी गहराई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने एक ऐसा बयान दिया जिसने जनसंख्या नीति पर नई बहस छेड़ दी। उनका कहना था कि हर भारतीय परिवार को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्होंने यह राय केवल भावनात्मक आधार पर नहीं रखी, बल्कि इसके पीछे उन्होंने वैज्ञानिक तर्क और सामाजिक चिंताओं का हवाला दिया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत में कई राज्य "हम दो, हमारे दो" जैसी नीतियों पर विचार कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि भागवत का तीन बच्चों वाला सुझाव जनसंख्या नीति और देश की सामाजिक संरचना को लेकर नए सवाल खड़ा करता है। इस लेख में हम इस बयान के वैज्ञानिक और राजनीतिक आधारों को समझेंगे और उन महापुरुषों का जिक्र करेंगे जो अपने परिवार की तीसरी, चौथी या पांचवीं संतान होकर भी इतिहास बदल गए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण जनसंख्या विज्ञान में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है Replacement Level Fertility (RLF) । इसका मतलब है कि किसी समाज को स्थिर बनाए र...